अभ्यारिष्ट: फायदे, उपयोग, सामग्री, सेवन विधि और सावधानियां
भूमिका
आयुर्वेद में पाचन तंत्र को स्वास्थ्य की नींव माना जाता है, क्योंकि अगर पाचन शक्ति मजबूत रहती है, तो पूरा शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है, लेकिन अगर यह कमजोर पड़ जाए या किसी कारण से विकृत हो जाए, तो कई तरह की बीमारियां जन्म लेने लगती हैं, जैसे कि कब्ज, गैस, अपच, भूख न लगना और यहां तक कि बवासीर जैसी समस्याएं भी, जो आज की तेज रफ्तार वाली जीवनशैली में बेहद आम हो चुकी हैं, जहां अनियमित खान-पान, तनाव और कम शारीरिक गतिविधि इन दिक्कतों को और बढ़ावा देती हैं। इन सभी समस्याओं का एक प्रभावी समाधान आयुर्वेद में मौजूद है, और वह है एक प्रसिद्ध क्लासिकल दवा अभ्यारिष्ट, जो मुख्य रूप से हरितकी पर आधारित होती है और आयुर्वेद में इसे सबसे श्रेष्ठ पथ्य द्रव्य के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यह न केवल तात्कालिक राहत प्रदान करती है, बल्कि पाचन तंत्र को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने में भी मदद करती है, खासकर कब्ज, बवासीर, कमजोर पाचन और अन्य पेट संबंधी विकारों में यह बेहद प्रभावी साबित हुई है। आइए, हम इस दवा की पूरी डिटेल को विस्तार से समझते हैं, ताकि आप इसके लाभों, उपयोग और सावधानियों के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त कर सकें और इसे अपने स्वास्थ्य के लिए सही तरीके से अपनाने का फैसला ले सकें।
Table of Contents
अभ्यारिष्ट क्या है?
अभ्यारिष्ट एक पारंपरिक आयुर्वेदिक तरल दवा है, जो अरिष्ट श्रेणी में आती है और इसे गुड़ या चीनी के साथ एक विशेष किण्वन प्रक्रिया से तैयार किया जाता है, जिसके दौरान इसमें 5-10% प्राकृतिक अल्कोहल का निर्माण होता है, जो दवा के सक्रिय तत्वों को शरीर में तेजी से पचाने और अवशोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह अल्कोहल दवा की प्रभावशीलता को बढ़ाता है और पाचन प्रक्रिया को सुगम बनाता है। इस दवा का नाम हरितकी, जिसे अभया भी कहा जाता है, से प्रेरित है, और हरितकी को आयुर्वेद में शरीर को रोगों से मुक्त करने वाली या भय से दूर करने वाली जड़ी-बूटी के रूप में देखा जाता है, जो न केवल पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करती है, बल्कि समग्र स्वास्थ्य को भी संतुलित रखने में सहायक होती है, इसलिए अभ्यारिष्ट को आयुर्वेद की क्लासिकल रेसिपी में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, और यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो पुरानी पेट की दिक्कतों से जूझ रहे हैं।
आयुर्वेदिक वर्गीकरण
अभ्यारिष्ट की आयुर्वेदिक विशेषताओं को समझना जरूरी है, क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि यह दवा कैसे काम करती है और किन दोषों पर इसका प्रभाव पड़ता है; उदाहरण के लिए, इसकी कल्पना अरिष्ट है, मुख्य द्रव्य हरितकी (अभया) है, रस कषाय और मधुर है, गुण लघु और रूक्ष हैं, वीर्य उष्ण है, विपाक मधुर है, दोष प्रभाव वात-कफ शामक है, और प्रमुख कर्म दीपनीय, पाचनीय तथा अनुलोमन हैं, जो सभी मिलकर दवा को पाचन तंत्र के लिए एक संपूर्ण समाधान बनाते हैं, जहां दीपनीय गुण अग्नि को तेज करता है, पाचनीय विषाक्त पदार्थों को पचाता है, और अनुलोमन मल त्याग को सुगम बनाता है, इसलिए यह वर्गीकरण हमें बताता है कि अभ्यारिष्ट विशेष रूप से वात और कफ से जुड़ी समस्याओं में कारगर है।
अभ्यारिष्ट की मुख्य सामग्री
अभ्यारिष्ट की रेसिपी आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार थोड़ी अलग-अलग हो सकती है, लेकिन आमतौर पर इसमें कुछ प्रमुख सामग्रियां शामिल होती हैं जो इसे इतना प्रभावी बनाती हैं, जैसे कि हरितकी (Terminalia chebula) जो मुख्य घटक है और पाचन को मजबूत करने में माहिर है, दंती मूल जो विरेचक गुण प्रदान करता है, चित्रक मूल जो अग्नि को तेज करता है, त्रिवृत जो मल को नरम बनाता है, मुस्ता जो पेट की सूजन कम करता है, विडंग जो कीड़ों और परजीवियों से लड़ता है, गुड़ या चीनी जो किण्वन प्रक्रिया के लिए जरूरी है, और जल जो आधार के रूप में काम करता है; ये सभी सामग्रियां मिलकर पाचन तंत्र को सक्रिय करती हैं, आंतों की सफाई करती हैं और मल का आसान निष्कासन सुनिश्चित करती हैं, जिससे दवा का समग्र प्रभाव बढ़ जाता है और यह विभिन्न पेट संबंधी विकारों में उपयोगी साबित होती है।
अभ्यारिष्ट की संघटक सामग्री ग्रंथानुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है, परंतु सामान्यतः इसमें निम्न द्रव्य पाए जाते हैं:
- हरितकी (Terminalia chebula) – मुख्य घटक
- दंती मूल
- चित्रक मूल
- त्रिवृत
- मुस्ता
- विडंग
- गुड़ / शर्करा – किण्वन हेतु
- जल
इन सभी द्रव्यों का संयुक्त प्रभाव पाचन तंत्र को सक्रिय कर मल का सम्यक् निष्कासन सुनिश्चित करता है।
अभ्यारिष्ट कैसे काम करती है?
अभ्यारिष्ट का कार्य मुख्य रूप से पाचन अग्नि, विषाक्त पदार्थों और अपान वात पर केंद्रित होता है, जहां सबसे पहले यह अग्नि पर असर करती है और दीपन-पाचन गुणों से जठराग्नि को प्रदीप्त बनाती है, जिससे भोजन का सही पाचन होता है और अपच जैसी समस्याएं दूर होती हैं; दूसरा, यह कमजोर पाचन से बने आम दोष या विषाक्त पदार्थों को पचाकर शरीर से बाहर निकालने में मदद करती है, जो कई रोगों की जड़ होते हैं; और तीसरा, कब्ज का मुख्य कारण अपान वात की गड़बड़ी होती है, इसलिए अभ्यारिष्ट अपान वात को संतुलित कर मल त्याग को आसान बनाती है, जिससे आंतों की गतिशीलता बढ़ती है और समग्र पाचन प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है, इस तरह यह दवा न केवल लक्षणों को दूर करती है, बल्कि समस्या की जड़ को भी लक्षित करती है।
अभ्यारिष्ट के मुख्य फायदे
अभ्यारिष्ट के कई स्वास्थ्य लाभ हैं जो इसे आयुर्वेद की एक लोकप्रिय दवा बनाते हैं, जैसे कि कब्ज में यह मृदु विरेचक के रूप में काम करती है और पुरानी से पुरानी कब्ज को दूर करके तत्काल राहत प्रदान करती है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी आसान हो जाती है; बवासीर में यह कब्ज कम करके दर्द, सूजन और रक्तस्राव को घटाती है, जो इस रोग से पीड़ित लोगों के लिए बड़ी राहत है; अपच और गैस से छुटकारा दिलाने में यह भोजन के बाद आने वाले भारीपन, डकार और पेट फूलने जैसी दिक्कतों को कम करती है; कमजोर पाचन में सुधार करके यह भूख न लगने या अरुचि की समस्या को दूर करती है और अग्नि को मजबूत बनाती है; आंतों की सफाई में नियमित उपयोग से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं, जिससे शरीर की समग्र शुद्धि होती है; और वजन प्रबंधन में यह बेहतर पाचन से मेटाबॉलिज्म को सुधारती है, जो उन लोगों के लिए उपयोगी है जो वजन संतुलित रखना चाहते हैं।

1. पाचन शक्ति को सुदृढ़ करता है (Improves Digestion)
एक चिकित्सक के रूप में मेरा अनुभव कहता है कि अधिकांश रोगों की शुरुआत कमज़ोर पाचन शक्ति से होती है। जब जठराग्नि मंद हो जाती है, तब भोजन ठीक से पच नहीं पाता और वही अधपचा भोजन आगे चलकर गैस, अपच और भारीपन का कारण बनता है।
अभ्यारिष्ट शरीर में पाचक एंज़ाइम्स की क्रियाशीलता को बढ़ाता है, जिससे भोजन का समुचित पाचन होता है और पोषक तत्वों का सही अवशोषण संभव हो पाता है। इसके नियमित सेवन से पेट फूलना, डकार, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याएँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं।
यह औषधि पाचन तंत्र को केवल चलाती नहीं, बल्कि उसे स्वस्थ रूप से काम करना सिखाती है।
2. मेटाबॉलिज़्म को सक्रिय करता है (Boosts Metabolism)
आयुर्वेद में मेटाबॉलिज़्म को अग्नि कहा गया है। जब अग्नि मंद होती है, तब शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलने में असमर्थ हो जाता है और व्यक्ति हमेशा सुस्ती, थकान और भारीपन महसूस करता है।
अभ्यारिष्ट अग्नि को प्रज्वलित कर पाचन के साथ-साथ मेटाबॉलिक रेट को भी सुधारता है। इससे भोजन केवल पेट में नहीं रुकता, बल्कि सही ढंग से टूटकर शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचता है। यही कारण है कि इसके सेवन से व्यक्ति स्वयं को हल्का, ऊर्जावान और सक्रिय अनुभव करता है।
3. आंतों की सफाई करता है (Detoxifies the Gut)
जब आंतों में लंबे समय तक मल और विषैले तत्व जमा रहते हैं, तब पाचन तंत्र सुस्त हो जाता है और शरीर में एक अजीब सी जकड़न और भारीपन महसूस होने लगता है।
अभ्यारिष्ट का नियमित सेवन जठरांत्र मार्ग (Gastrointestinal tract) की गहराई से सफाई करता है। यह धीरे-धीरे आम दोष और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है, जिससे आंतें स्वच्छ होती हैं और पाचन तंत्र फिर से सक्रिय रूप से कार्य करने लगता है।
इसी कारण कई रोगियों को इसके सेवन से मानसिक हल्कापन भी महसूस होता है, क्योंकि पेट और मन का सीधा संबंध है।
4. वजन प्रबंधन में सहायक (Supports Weight Management)
वजन बढ़ने का कारण केवल अधिक खाना नहीं, बल्कि गलत पाचन और कमजोर मेटाबॉलिज़्म भी होता है। जब शरीर भोजन को सही ढंग से नहीं तोड़ पाता, तब वसा और कार्बोहाइड्रेट शरीर में जमा होने लगते हैं।
अभ्यारिष्ट पाचन और मेटाबॉलिज़्म दोनों को सुधारकर वसा और कार्बोहाइड्रेट के उचित विघटन में सहायता करता है। इससे शरीर अनावश्यक रूप से चर्बी जमा नहीं करता और वजन संतुलन की दिशा में धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।
5. रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है (Enhances Immunity)
एक स्वस्थ पाचन तंत्र ही मजबूत इम्युनिटी की नींव होता है। अभ्यारिष्ट में उपस्थित औषधीय द्रव्य, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने में सहायता करते हैं।
यह औषधि शरीर को अंदर से मज़बूत बनाकर संक्रमणों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती है और बार-बार बीमार पड़ने की प्रवृत्ति को कम करती है।
6. यकृत (लिवर) के स्वास्थ्य को समर्थन देता है (Supports Liver Health)
लिवर शरीर का मुख्य डिटॉक्स अंग है। यदि लिवर ठीक से काम न करे, तो पूरा शरीर विषाक्त हो जाता है।
अभ्यारिष्ट लिवर को शुद्ध करने में सहायक है और उसकी कार्यक्षमता को बेहतर बनाता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण विषैले तत्वों को निष्क्रिय करने में मदद करते हैं और लिवर कोशिकाओं के पुनर्जीवन को समर्थन देते हैं, जिससे संपूर्ण शरीर का स्वास्थ्य सुधरता है।
7. कब्ज़ में अत्यंत प्रभावी (Relieves Constipation)
अभ्यारिष्ट का सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणित उपयोग कब्ज़ में है। आयुर्वेदिक दृष्टि से कब्ज़ मुख्यतः वात दोष की विकृति के कारण होती है।
अभ्यारिष्ट:
- अपान वात को संतुलित करता है
- आंतों की गतिशीलता (Peristalsis) को बढ़ाता है
- मल को कोमल बनाता है
- शौच के समय ज़ोर लगाने की आवश्यकता को कम करता है
इसका मुख्य घटक हरितकी पुरानी कब्ज़ में भी सुरक्षित रूप से राहत प्रदान करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभ्यारिष्ट आदत नहीं डालता, इसलिए यह लंबे समय तक सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।
8. बवासीर (Piles / Hemorrhoids) में लाभकारी
बवासीर का मुख्य कारण लंबे समय तक कब्ज़ और शौच के समय अत्यधिक ज़ोर लगाना होता है। अभ्यारिष्ट इस मूल कारण को ही ठीक करता है।
यह औषधि:
- सूजन, दर्द और जलन को कम करती है
- शौच को सहज बनाती है
- रक्तसंचार को बेहतर करती है
- क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत में सहायक होती है
इस प्रकार अभ्यारिष्ट बवासीर की तीव्रता को कम करता है और रक्तस्राव जैसी जटिलताओं से बचाव में मदद करता है।
9. भगंदर (Fistula-in-Ano) में सहायक
भगंदर एक गंभीर स्थिति है, जिसमें मलाशय और बाहरी त्वचा के बीच असामान्य मार्ग बन जाते हैं। इसमें दर्द, सूजन और संक्रमण की संभावना अधिक रहती है।
अभ्यारिष्ट पाचन को सुधारकर शौच के समय होने वाले अत्यधिक ज़ोर को कम करता है, जिससे घाव पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता। इसके सूजन-रोधी और उपचारक गुण संक्रमण की संभावना को घटाते हैं, दर्द और असुविधा को कम करते हैं तथा घाव भरने की प्रक्रिया को तेज़ करते हैं।
10. भूख न लगना (Loss of Appetite) में उपयोगी
भूख न लगना अक्सर कमजोर अग्नि और विषाक्त पाचन तंत्र का संकेत होता है। अभ्यारिष्ट जठराग्नि को उत्तेजित कर पाचक रसों के स्राव को बढ़ाता है।
यह औषधि पाचन तंत्र की सफाई कर भूख को स्वाभाविक रूप से लौटाने में सहायता करती है। विशेष रूप से बीमारी से उबरने के बाद या लंबे समय तक पाचन समस्या झेलने वाले रोगियों में यह अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है।
11. श्वेत कुष्ठ (Vitiligo) में सहायक भूमिका
यद्यपि अभ्यारिष्ट श्वेत कुष्ठ की मुख्य औषधि नहीं है, फिर भी इसके एंटीऑक्सीडेंट और डिटॉक्स गुण शरीर को अंदर से शुद्ध करते हैं। यह लिवर को पोषण देकर त्वचा स्वास्थ्य को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देता है। नियमित रूप से अन्य उपचारों के साथ लेने पर यह भूख, पाचन और समग्र स्वास्थ्य को सुधारता है, जिससे शरीर की उपचार क्षमता बढ़ती है और त्वचा रोगों से लड़ने में मदद मिलती है।
सेवन विधि और मात्रा
अभ्यारिष्ट की सेवन विधि सरल है, लेकिन इसे सही तरीके से अपनाना जरूरी है; सामान्य मात्रा 15-30 मिली होती है, जो दिन में 2 बार ली जाती है, और सबसे अच्छा समय भोजन के बाद का है, जहां इसे समान मात्रा में गुनगुने पानी के साथ मिलाकर पीना चाहिए, क्योंकि गुनगुना पानी दवा के अवशोषण को बढ़ाता है; हालांकि, रोग की गंभीरता, व्यक्ति की उम्र और प्रकृति के आधार पर मात्रा में बदलाव संभव है, इसलिए हमेशा एक योग्य आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है, ताकि कोई साइड इफेक्ट न हो और अधिकतम लाभ मिल सके।
कितने समय तक लें?
अभ्यारिष्ट का उपयोग कितने समय तक करना है, यह समस्या की प्रकृति पर निर्भर करता है; उदाहरण के लिए, सामान्य कब्ज में इसे 2-3 सप्ताह तक लेना पर्याप्त हो सकता है, जबकि पुरानी कब्ज या बवासीर जैसी गंभीर स्थितियों में 1-2 महीने तक का कोर्स जरूरी हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक इसका सेवन केवल डॉक्टर के मार्गदर्शन में ही करें, क्योंकि बिना सलाह के लगातार उपयोग से अनावश्यक प्रभाव पड़ सकते हैं, और नियमित जांच से यह सुनिश्चित होता है कि दवा आपके शरीर के अनुकूल काम कर रही है।
संभावित नुकसान
अभ्यारिष्ट सही मात्रा में लेने पर आमतौर पर सुरक्षित होती है और कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं दिखाती, लेकिन अगर ज्यादा मात्रा में ली जाए तो दस्त जैसी समस्या हो सकती है, जो अस्थायी होती है लेकिन असुविधाजनक हो सकती है; इसके अलावा, उष्ण प्रकृति वाले लोगों में यह जलन पैदा कर सकती है, इसलिए ऐसे व्यक्तियों को सतर्क रहना चाहिए; और बिना सलाह के लंबे समय तक सेवन अनुचित है, क्योंकि इससे शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है, इसलिए हमेशा निर्धारित मात्रा और अवधि का पालन करें।
सावधानियां
अभ्यारिष्ट का उपयोग करते समय कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी हैं, जैसे कि गर्भवती महिलाओं को इसे पूरी सावधानीपूर्वक सेवन करना चाहिए, क्योंकि यह उनके लिए उपयुक्त नहीं हो सकती; स्तनपान कराने वाली माताएं केवल डॉक्टर की सलाह से ही इसे लें, ताकि बच्चे पर कोई प्रभाव न पड़े; अल्सर या गंभीर आंत रोग वाले रोगी इसे न लें, क्योंकि यह स्थिति को और जटिल बना सकती है; और डायबिटीज वाले लोग सतर्क रहें, क्योंकि इसमें गुड़ होता है जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकता है, इसलिए रक्त शर्करा की नियमित जांच जरूरी है।
आधुनिक विज्ञान की नजर से
आधुनिक चिकित्सा में अभ्यारिष्ट को प्राकृतिक लैक्सेटिव और डाइजेस्टिव तत्वों से युक्त माना जाता है, जो आंतों की गति या पेरिस्टालसिस को बढ़ाती है, जिससे मल निकालना आसान हो जाता है और पाचन प्रक्रिया सुधारती है, इसलिए यह उन लोगों के लिए एक प्राकृतिक विकल्प है जो केमिकल आधारित दवाओं से बचना चाहते हैं, और वैज्ञानिक अध्ययनों में भी इसके कुछ घटकों के लाभ सिद्ध हुए हैं।
अभ्यारिष्ट और हरितकी का संबंध
हरितकी को आयुर्वेद में त्रिदोषहर कहा जाता है, मतलब यह वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित करती है, लेकिन यह विशेष रूप से वात दोष को नियंत्रित करने में माहिर है, इसलिए अभ्यारिष्ट, जो हरितकी पर आधारित है, वात से जुड़े पाचन विकारों में बेहतरीन परिणाम देती है, जैसे कि कब्ज और गैस, जहां वात की अधिकता मुख्य कारण होती है।
निष्कर्ष
अभ्यारिष्ट आयुर्वेद की एक सिद्ध, समय-परीक्षित और सुरक्षित दवा है, जो पाचन तंत्र को मजबूत बनाकर कई रोगों से बचाती है, जैसे कि कब्ज, बवासीर और कमजोर पाचन, जहां इसका महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यह न केवल लक्षणों को दूर करती है, बल्कि समस्या की जड़ को लक्षित करके समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है; सही उपयोग से यह स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाती है, लेकिन हमेशा आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह लें, ताकि कोई जोखिम न हो और अधिकतम फायदा मिल सके।
FAQ
Q1. क्या अभ्यारिष्ट रोजाना ली जा सकती है?
हां, लेकिन केवल सीमित समय और सही मात्रा में, क्योंकि लगातार उपयोग से आदत पड़ सकती है, इसलिए डॉक्टर की सलाह लें।
Q2. क्या यह आदत डाल देती है?
नहीं, अगर सही तरीके से और निर्धारित अवधि में ली जाए, तो यह आदत नहीं डालती, बल्कि पाचन को प्राकृतिक रूप से मजबूत बनाती है।
Q3. बच्चों को दी जा सकती है?
हां, लेकिन कम मात्रा में और केवल आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से, क्योंकि बच्चों की प्रकृति अलग होती है और मात्रा को अनुकूलित करना जरूरी है।
अस्वीकरण
यह लेख सिर्फ जानकारी के लिए है और किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है; कोई भी दवा लेने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करें,
