मल,मूत्र,स्वेद-शारीर से निकास के तीन मार्ग

मल, मूत्र और स्वेद: शरीर से निकास के तीन अनिवार्य मार्ग 

आयुर्वेद में शरीर को केवल मांस, रक्त और हड्डियों का ढांचा नहीं माना गया, बल्कि उसे एक जीवंत, निरंतर क्रियाशील तंत्र के रूप में समझा गया है। यह तंत्र तभी स्वस्थ रहता है जब शरीर के भीतर बनने वाले उपयोगी तत्व बने रहें और अनुपयोगी, विषैले या अतिरिक्त पदार्थ समय पर बाहर निकलते रहें
इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए आयुर्वेद ने शरीर में त्रिमल तीन प्रमुख निकास मार्गों का वर्णन किया है— मल (Purisha), मूत्र (Mutra) और स्वेद (Sweda)

ये तीनों मिलकर शरीर की आंतरिक स्वच्छता, दोष-संतुलन और जीवन-ऊर्जा के प्रवाह को बनाए रखते हैं। यदि इनका प्रवाह ठीक है, तो शरीर स्वस्थ रहता है; और यदि इनमें रुकावट आती है, तो रोग जन्म लेने लगते हैं।

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आयुर्वेद में मल, मूत्र और स्वेद का स्थान

आचार्य चरक और सुश्रुत के अनुसार,
शरीर में त्रिदोष (वात, पित्त, कफ), सप्त धातु और त्रि मल—इन तीनों का संतुलन ही स्वास्थ्य की परिभाषा है।

“समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः।”
— चरक संहिता

अर्थात, जब दोष, अग्नि, धातु और मल की क्रियाएँ संतुलित रहती हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ होता है।

यहाँ मल का अर्थ केवल गंदगी नहीं, बल्कि वे सभी पदार्थ हैं जो शरीर के लिए अब उपयोगी नहीं रहे।

1. मल (Purisha): पाचन तंत्र की अंतिम सच्चाई

मल, पाचन प्रक्रिया का अंतिम परिणाम है।
जो भोजन शरीर द्वारा उपयोग कर लिया जाता है, उसके बाद जो शेष बचता है—वही मल के रूप में बाहर निकलता है।

मल का निर्माण कैसे होता है?

भोजन → जठराग्नि → पाचन → रस → धातु पोषण → अवशेष = मल

यह प्रक्रिया बताती है कि मल की गुणवत्ता सीधे अग्नि (Digestive Fire) से जुड़ी होती है।

स्वस्थ मल के लक्षण

आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ मल के गुण हैं:

  • न बहुत कठोर, न बहुत ढीला
  • बिना अधिक दुर्गंध
  • प्रतिदिन सहज रूप से निष्कासन
  • पेट हल्का महसूस होना

स्वस्थ मल इस बात का संकेत है कि पाचन सही है और वात दोष संतुलित है

मल विकृति होने पर क्या होता है?

जब मल शरीर में रुकता है या गलत रूप में बनता है, तो:

  • कब्ज
  • गैस
  • सिरदर्द
  • त्वचा रोग
  • मानसिक चिड़चिड़ापन
    जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

आयुर्वेद में इसे आम (Ama) का संचय माना गया है, जो कई रोगों की जड़ है।

2. मूत्र (Mutra): शरीर की आंतरिक सफाई का दर्पण

मूत्र का कार्य केवल तरल अपशिष्ट को बाहर निकालना नहीं, बल्कि शरीर के द्रव संतुलन को बनाए रखना भी है।

मूत्र की उत्पत्ति

भोजन और पेय से प्राप्त द्रव → धातु पोषण → अनुपयोगी द्रव → मूत्र

यह प्रक्रिया बताती है कि मूत्र रक्त और रस धातु की शुद्धता को दर्शाता है।

स्वस्थ मूत्र के लक्षण

  • हल्का पीला रंग
  • बिना जलन
  • संतुलित मात्रा
  • बार-बार या बहुत कम न आना

स्वस्थ मूत्र यह संकेत देता है कि पित्त और कफ दोष नियंत्रित हैं

मूत्र विकृति के परिणाम

यदि मूत्र की क्रिया बिगड़ती है, तो:

  • जलन
  • बार-बार पेशाब
  • मूत्र मार्ग संक्रमण
  • शरीर में सूजन
    जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।

आयुर्वेद में इसे मेह रोगों की प्रारंभिक अवस्था भी माना गया है।

3. स्वेद (Sweda): त्वचा द्वारा निकास का मार्ग

स्वेद यानी पसीना, शरीर की ऊष्मा और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का प्राकृतिक माध्यम है।

स्वेद का कार्य

  • शरीर का तापमान नियंत्रित करना
  • त्वचा के रोमछिद्रों को साफ रखना
  • कफ दोष को संतुलित करना

स्वेद न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक हल्केपन में भी सहायक होता है।

स्वस्थ स्वेद के लक्षण

  • हल्का, बिना तीव्र दुर्गंध
  • मौसम और श्रम के अनुसार
  • पसीने के बाद ताजगी का अनुभव

यह दर्शाता है कि त्वचा और कफ दोष स्वस्थ हैं

स्वेद की विकृति

  • अधिक पसीना → कमजोरी, दुर्गंध
  • कम पसीना → त्वचा रूखापन, गर्मी

आयुर्वेद में स्वेद की कमी या अधिकता को त्वचा रोगों और जोड़ों की समस्याओं से जोड़ा गया है।

तीनों मल का परस्पर संबंध

मल, मूत्र और स्वेद—तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
यदि एक में गड़बड़ी होती है, तो उसका प्रभाव अन्य दो पर भी पड़ता है।

उदाहरण:

  • कब्ज → त्वचा समस्या → कम स्वेद
  • कम मूत्र → शरीर में विष → पसीने की दुर्गंध

इसलिए आयुर्वेद समग्र संतुलन पर जोर देता है, न कि केवल लक्षणों पर।

आयुर्वेदिक जीवनशैली: निकास मार्गों को स्वस्थ कैसे रखें

1. सही दिनचर्या

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठना
  • शौच को न रोकना
  • नियमित समय पर भोजन

2. अग्नि को मजबूत रखें

  • हल्का, सुपाच्य भोजन
  • अधिक ठंडा या बासी भोजन न करें

3. पर्याप्त जल सेवन

  • गुनगुना पानी
  • दिनभर छोटे घूंट

4. पसीने का सम्मान

  • नियमित योग, प्राणायाम
  • आवश्यकता अनुसार स्वेदन

आधुनिक जीवन और आयुर्वेदिक चेतावनी

आज की जीवनशैली—जंक फूड, देर रात जागना, पानी कम पीना—इन तीनों निकास मार्गों को सबसे पहले प्रभावित करती है।
परिणामस्वरूप रोग धीरे-धीरे जन्म लेते हैं, जिनकी जड़ अक्सर मल विकृति में छिपी होती है।


निष्कर्ष: स्वास्थ्य का रास्ता निकास से होकर जाता है

आयुर्वेद हमें यह सिखाता है कि
शरीर को भरने से अधिक ज़रूरी है—उसे सही तरीके से खाली करना।

मल, मूत्र और स्वेद—यदि ये तीनों मार्ग सुचारु हैं, तो शरीर स्वयं रोगों से लड़ने में सक्षम हो जाता है।
यही आयुर्वेद का मूल दर्शन है—
रोग को दबाना नहीं, शरीर को संतुलित करना।

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